
अफगानिस्तान के तालिबान शासन के विदेश मंत्री आमिर खान मुतकी की भारत यात्रा ने दक्षिण एशिया की कूटनीति में नई दिशा दी है।इस दौरान भारत की धरती से पाकिस्तान को आतंकवाद पर दिए गए कड़े संदेश ने क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित किया है।
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🔍 व्यावहारिकता बनाम विचारधारा: तालिबान की नई विदेश अंतरराष्ट्रीय संबंधों में विचारधारा से अधिक राष्ट्रीय हित मायने रखते हैं।
2021 में अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद भारत को आशंका थी कि यह शासन पाकिस्तान के प्रभाव में रहेगा।
लेकिन अब तालिबान भारत को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है, जो एक बड़ा बदलाव है।
🇮🇳 तालिबान विदेश मंत्री का भारत दौरा: एक नई शुरुआत
यह 2021 के बाद किसी तालिबानी नेता की भारत की सर्वोच्च स्तरीय यात्रा थी।
इस दौरे को व्यापार, कनेक्टिविटी और आतंकवाद-विरोधी सहयोग के नए चरण के रूप में देखा जा रहा है।
⚠️ पाकिस्तान को भारत से मिला कड़ा संदेश
आतंकी समूहों पर स्पष्ट रुख
मुताकी ने कहा, “अफगानिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद जैसा कोई आतंकी समूह नहीं है।”
उन्होंने आश्वासन दिया कि तालिबान अपनी ज़मीन का एक इंच भी आतंकियों को नहीं देगा।
पाकिस्तान पर अप्रत्यक्ष हमला
मुताकी ने कहा, “हमने ऐसे समूहों के खिलाफ कार्रवाई की है, दूसरे देशों को भी ऐसा करना चाहिए।”
यह बयान पाकिस्तान पर सीधा संकेत था, जिस पर आतंकियों को पनाह देने के आरोप लगते रहे हैं।
सीधी चेतावनी
पाकिस्तान के हालिया हवाई हमलों पर मुताकी ने कहा, “अफगान लोगों की परीक्षा लेना गलती होगी।”
यह चेतावनी थी कि यदि हमले जारी रहे, तो अफगानिस्तान जवाबी कार्रवाई कर सकता है।
🌍 भारत से बयान देना क्यों महत्वपूर्ण है?
- भू-राजनीतिक संकेत: भारत से पाकिस्तान की आलोचना करना तालिबान की स्वतंत्र विदेश नीति का संकेत है।
- अंतर्राष्ट्रीय छवि: तालिबान खुद को आतंकवाद विरोधी और जिम्मेदार शासन के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।
- राजनयिक वैधता: भारत जैसे देश से समर्थन मिलने से तालिबान को वैश्विक मान्यता की दिशा में मदद मिलती है।
🛡️ भारत की रणनीति और प्रतिक्रिया
राजनयिक जुड़ाव
भारत ने इस यात्रा को महत्व देते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मुताकी से मुलाकात करवाई।
भारत ने काबुल में अपनी एम्बेसी को फिर से खोलने का निर्णय लिया है।
राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा
- भारत अफगानिस्तान में अपने निवेशों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है।
- यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि अफगान धरती का उपयोग भारत विरोधी आतंकवाद के लिए न हो।
🎯 तालिबान की रणनीतिक मंशा
- वैधता प्राप्त करना: वैश्विक मान्यता हासिल करना।
- पाकिस्तान पर दबाव: यह दिखाना कि तालिबान अब इस्लामाबाद पर निर्भर नहीं है।
- संतुलन बनाना: चीन और पाकिस्तान से दूरी बनाकर भारत से संबंध सुधारना।
- आर्थिक सहायता: भारत से व्यापार और मानवीय मदद की उम्मीद।
🔚 निष्कर्ष
तालिबान विदेश मंत्री का भारत दौरा और उनके बयान दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक निर्णायक मोड़ हैं।
यह स्पष्ट करता है कि अफगानिस्तान अब पाकिस्तान के प्रभाव से बाहर निकलकर स्वतंत्र विदेश नीति की ओर बढ़ रहा है।
वहीं भारत भी अपने रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देते हुए तालिबान से व्यावहारिक जुड़ाव की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
🔗 इस न्यूज को और विस्तार से पढ़ सकते है :
BBC HINDI रिपोर्ट: तालिबान विदेश मंत्री की भारत यात्रा
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